Posts

Showing posts from October, 2018

सब जीवन बीता जाता है

सब जीवन बीता जाता है धूप छाँह के खेल सदॄश सब जीवन बीता जाता है समय भागता है प्रतिक्षण में, नव-अतीत के तुषार-कण में, हमें लगा कर भविष्य-रण में, आप कहाँ छिप जाता है सब जीवन बीता जाता है बुल्ले, नहर, हवा के झोंके, मेघ और बिजली के टोंके, किसका साहस है कुछ रोके, जीवन का वह नाता है सब जीवन बीता जाता है वंशी को बस बज जाने दो, मीठी मीड़ों को आने दो, आँख बंद करके गाने दो जो कुछ हमको आता है सब जीवन बीता जाता है ~  जयशंकर प्रसाद

अव्यवस्थित

विश्व के नीरव निर्जन में। जब करता हूँ बेकल, चंचल, मानस को कुछ शान्त, होती है कुछ ऐसी हलचल, हो जाता हैं भ्रान्त, भटकता हैं भ्रम के बन में, विश्व के कुसुमित कानन में। जब लेता हूँ आभारी हो, बल्लरियों से दान कलियों की माला बन जाती, अलियों का हो गान, विकलता बढ़ती हिमकन में, विश्वपति! तेरे आँगन में। जब करता हूँ कभी प्रार्थना, कर संकलित विचार, तभी कामना के नूपुर की, हो जाती झनकर, चमत्कृत होता हूँ मन में, विश्व के नीरव निर्जन में। ~ जयशंकर प्रसाद