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सब जीवन बीता जाता है

सब जीवन बीता जाता है धूप छाँह के खेल सदॄश सब जीवन बीता जाता है समय भागता है प्रतिक्षण में, नव-अतीत के तुषार-कण में, हमें लगा कर भविष्य-रण में, आप कहाँ छिप जाता है सब जीवन बीता जाता है बुल्ले, नहर, हवा के झोंके, मेघ और बिजली के टोंके, किसका साहस है कुछ रोके, जीवन का वह नाता है सब जीवन बीता जाता है वंशी को बस बज जाने दो, मीठी मीड़ों को आने दो, आँख बंद करके गाने दो जो कुछ हमको आता है सब जीवन बीता जाता है ~  जयशंकर प्रसाद

अव्यवस्थित

विश्व के नीरव निर्जन में। जब करता हूँ बेकल, चंचल, मानस को कुछ शान्त, होती है कुछ ऐसी हलचल, हो जाता हैं भ्रान्त, भटकता हैं भ्रम के बन में, विश्व के कुसुमित कानन में। जब लेता हूँ आभारी हो, बल्लरियों से दान कलियों की माला बन जाती, अलियों का हो गान, विकलता बढ़ती हिमकन में, विश्वपति! तेरे आँगन में। जब करता हूँ कभी प्रार्थना, कर संकलित विचार, तभी कामना के नूपुर की, हो जाती झनकर, चमत्कृत होता हूँ मन में, विश्व के नीरव निर्जन में। ~ जयशंकर प्रसाद

याद

बिदा हो गई साँझ, विनत मुख पर झीना आँचल धर, मेरे एकाकी आँगन में मौन मधुर स्मृतियाँ भर! वह केसरी दुकूल अभी भी फहरा रहा क्षितिज पर, नव असाढ़ के मेघों से घिर रहा बराबर अंबर! मैं बरामदे में लेटा, शैय्या पर, पीड़ित अवयव, मन का साथी बना बादलों का विषाद है नीरव! सक्रिय यह सकरुण विषाद,--मेघों से उमड़ उमड़ कर भावी के बहु स्वप्न, भाव बहु व्यथित कर रहे अंतर! मुखर विरह दादुर पुकारता उत्कंठित भेकी को, बर्हभार से मोर लुभाता मेघ-मुग्ध केकी को; आलोकित हो उठता सुख से मेघों का नभ चंचल, अंतरतम में एक मधुर स्मृति जग जग उठती प्रतिपल! कम्पित करता वक्ष धरा का घन गभीर गर्जन स्वर, भू पर ही आगया उतर शत धाराओं में अंबर! भीनी भीनी भाप सहज ही साँसों में घुल मिल कर एक और भी मधुर गंध से हृदय दे रही है भर! नव असाढ़ की संध्या में, मेघों के तम में कोमल, पीड़ित एकाकी शय्या पर, शत भावों से विह्वल, एक मधुरतम स्मृति पल भर विद्युत सी जल कर उज्वल याद दिलाती मुझे हृदय में रहती जो तुम निश्चल! ~ सुमित्रानंदन पंत

मोह

छोड़ द्रुमों की मृदु-छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन? भूल अभी से इस जग को! तज कर तरल-तरंगों को, इन्द्र-धनुष के रंगों को, तेरे भ्रू-भंगों से कैसे बिंधवा दूँ निज मृग-सा मन? भूल अभी से इस जग को! कोयल का वह कोमल-बोल, मधुकर की वीणा अनमोल, कह, तब तेरे ही प्रिय-स्वर से कैसे भर लूँ सजनि! श्रवन? भूल अभी से इस जग को! ऊषा-सस्मित किसलय-दल, सुधा रश्मि से उतरा जल, ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दूँ जीवन? भूल अभी से इस जग को! ~  सुमित्रानंदन पंत
मैं मधुबाला मधुशाला की, मैं मधुशाला की मधुबाला! मैं मधु-विक्रेता को प्यारी, मधु के धट मुझ पर बलिहारी, प्यालों की मैं सुषमा सारी, मेरा रुख देखा करती है मधु-प्यासे नयनों की माला। मैं मधुशाला की मधुबाला ~ हरिवंशराय बच्चन

मौन निमंत्रण

  स्तब्ध-ज्योत्सना में जब संसार चकित रहता शिशु सा नादान, विश्‍व के पलकों पर सुकुमार विचरते हैं जब स्वप्न अजान; न जाने, नक्षत्रों से कौन निमंत्रण देता मुझको मौन! सघन मेघों का भीमाकाश गरजता है तब तमसाकार, दीर्घ भरता समीर निः श्‍वास प्रखर झरती जब पावस धार न जाने, तपक तडित में कौन मुझे इंगित करता तब कौन देख वसुधा का यौवन भार गूंज उठता है जब मधुमास विधुर उर के से मृदु उद्‌गार कुसुम जब खुल पड़ते सोच्छ्वास ना जाने सौरभ के मिस कौन संदेशा मुझे भेजता मौन! ना जाने कौन; अये छविमान जान मुझको अबोध, अज्ञान, सुझाते हो तुम पथ अनजान, फूंक देते छिन्दों में गान अहा सुख-दुख हा सहचर मौन! नहीं कह सकती तुम हो कौन! - सुमित्रा नंदन पंत
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती लहरों से डरकर नैया पार नहीं होती नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है चडती दीवारों पर सौ बार फिसलती है मन का विश्‍वास रगों में साहस भरता है चढ़ कर गिरना, गिर कर चढ़ना न अखरता है आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती कोशिश करने वालों की हार नहीं होती डुबकियां सिन्धु में गोताखोर लगाता है जा जा कर खाली हाथ लौट आता है मिलते ना सहज ही मोती पानी में बढ़ता दूना उत्साह इसी हैरानी में मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो क्या कमी रह गयी, देखो और सुधार करो जब तक ना सफल हो, नींद चैन से त्याग दो तुम संघर्ष करो मैदान छोड़ मत भागो तुम कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती - हरिवंश राय बच्चन