मौन निमंत्रण
स्तब्ध-ज्योत्सना में जब संसार चकित रहता शिशु सा नादान, विश्व के पलकों पर सुकुमार विचरते हैं जब स्वप्न अजान; न जाने, नक्षत्रों से कौन निमंत्रण देता मुझको मौन! सघन मेघों का भीमाकाश गरजता है तब तमसाकार, दीर्घ भरता समीर निः श्वास प्रखर झरती जब पावस धार न जाने, तपक तडित में कौन मुझे इंगित करता तब कौन देख वसुधा का यौवन भार गूंज उठता है जब मधुमास विधुर उर के से मृदु उद्गार कुसुम जब खुल पड़ते सोच्छ्वास ना जाने सौरभ के मिस कौन संदेशा मुझे भेजता मौन! ना जाने कौन; अये छविमान जान मुझको अबोध, अज्ञान, सुझाते हो तुम पथ अनजान, फूंक देते छिन्दों में गान अहा सुख-दुख हा सहचर मौन! नहीं कह सकती तुम हो कौन! - सुमित्रा नंदन पंत